क्या हम बदलेंगे, की हमारा समाज और हमारी सोच और नीचे जाएगी।

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  • Category: news
  • Post date: .... 2020




चलिये मिलकर इस ख़बर को पढ़ते हैं। एक पाँच साल की बच्ची को बलात्कार की धमकी एक मरे हुए समाज में ही मिल सकती हैं।
आपकी जांघों के बीच आपका पुरुष होने का दम्भ जिंदा है। ये मानसिकता भरी जाती है लोगों के अंदर।
याद दिलाया जाता है कि आप पुरुष हैं।
चलिये, लानत भेजते है अपने अंदर के पुरुष को!
ऐसी खबरें जो ना जाने कई बार आती रहती है और हम उसे अनदेखा कर के आगे बढ़ जाते है लेकिन कभी कुछ ऐसा हो जाता है जिसपर बोलना जरूरी हो जाता है। ऐसी खबरें देख कर मुझे अपने पुरुष होने पर घिन्न आने लगती है , आनी भी चाहिए जब तक हमारे समाज का हर एक पुरुष इस घटिया सोच से मुक्त नहीं हो जाता।
5 साल की उस बच्ची को रेप की धमकी वो भी उसके पिता की वजह से वहीं पिता जिनके बदौलत भारत ने क्रिकेट की दुनिया में उस हर बुलंदियों को छुआ है, उसने ना जाने कितने बार भारत को जीत दिलाकर कर हमें खुशियां दी है।
उसके लिए नहीं बल्कि उसकी बेटी के लिए ये धमकी , ये घटिया, नीच हरकत। वो धमकी पढ़ कर लगा ये कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन उसने उस आदमी ने ये सरेआम लिख दिया है।
ऐसे लोग हमारे समाज के वो Potential Rapist है जो कभी भी किसी भी समय किसी लड़की को अपना शिकार बना सकते है।
आए दिन सोशल मीडिया पर Comments में या DM में लड़कियों को रेप की धमकियां मिलती रहती है। गाली और खास कर रण्डी बुलाना तो बहुत आम हो गया इतना आम की मैं यहां लिखने में भी नहीं हिचक रहा।
ऐसे लोगो को अपने मर्दानगी जिसका झूठा दंभ भर के ये सब लिखते है "उनको अपने लिंग पर ही नहीं अपने बाप के लिंग पर भी शर्मिंदगी महसूस करनी चाहिए जिसके वजह से वो इस दुनिया में आए है।"
ऐसी सोच हमारे समाज की उसी सोच से प्रेरित है जिसमें लड़ाई तो दो मर्दों की होती है लेकिन जुबानी जंग में सबसे ज्यादा मां, बहन और बेटी को ही घसीटा जाता है। ये कब बंद होगा पता नहीं कोई इसे बंद करने की बात भी नहीं करता। लेकिन रेप की धमकी कोई भी मर्द या जैसे यहां 16 साल के लड़के ने दिया है या देता है ये हमें सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या आने वाली पीढ़ियां इस समाज में बेटियां पैदा करना ही बंद कर देंगी। क्या हम बदलेंगे की हमारा समाज और हमारी सोच और नीचे जाएगी।
परसाई जी ने ठीक कहा था -
हम मानसिक रूप से 'दोगले' नहीं 'तिगले' हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अर्द्ध-पूँजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं।
(~अभिषेक कुमार)