बाबा का ढाबा: सोशल मीडिया की सकारत्मक पहल। एक संदेश- सूर्यांश ठाकुर की कलम सें!

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  • Category: संदेश
  • Post date: .... 2020




संघर्ष के अस्सी साल। अस्सी साल बाद वो दिन आखिर आ ही गया। अस्सी साल बाद आँखो में भरा गर्म पानी ठंडा होकर आज बहा। चेहरे की झुर्रियां जो गर्म पानी से कट गई थी, उन्हें आज अस्सी साल बाद शीतलता मिली। अस्सी साल के संघर्ष का फल ऐसा कि एक छोटी सी दुकान को करोड़ों जान गए। गज़ब! सच मे गज़ब।
ये तो होने वाला ही था। भगोने में मटर पनीर की सब्ज़ी को देखकर लगता है कि बाबा और दादी को शायद इस दिन का इंतजार था। शायद नही भी। क्योंकि कैमेरा के सामने छलके उनके आँसू से लगता है कि उन्हें इस संघर्ष की आदत हो गयी थी, पता नही। लेकिन इतना ज़रूर पता है कि मर जाना उन्होंने नही चुना था। इंतज़ार भी होता तो मौत के लिए दावत में स्वादिष्ट मटर-पनीर नही ही हर रोज़ कोई बनाता। भीख भी मांग ही सकते थे। बुज़ुर्गो को लोग दे ही देते हैं। शाम तक दो-दो पूड़ी मिल ही जाती। उनकी उतनी ही ख़ुराक होगी। मौत का इंतज़ार करने का पारंपरिक तरीका यही है। लेकिन उन्होंने ये सब नही चुना। उन्होंने चुना अपने कर्म को। संघर्ष को। और अस्सी साल लग गए लड़ाई लड़ते-लड़ते। जीत आज हुई। लेकिन हुई। और देखिए ज़रिया भी कौन सी चीज बनी। सोशल मीडिया। जो सकारात्मकता से अधिक नकारात्मकता का कारण बनती जा रही है। यानि स्कोप यहाँ भी है।
मेरी माँ 5 मिनट का ये वीडियो पूरा नही देख पाई। रोने लगी। उन्हें रोता देखकर मैं सोच मे पड़ गया कि ये तो बस उनके अस्सी साल में से 5 मिनट का एक हिस्सा है। उन्होंने अपना अस्सी साल कैसे देखा होगा?
बहरहाल अब इतना समझ आया कि, “जीवन की जंग में हार मान लेना कोई ऑप्शन नही होता है। हाल कितने भी बद्तर हो, लड़ लेना चाहिए। क्या पता जीत ही जाएं। लड़ लेने से जीत की थोड़ी सी उम्मीद तो बँधी रहेगी। हार मान लेने से कोई उम्मीद नही बचती। कुछ भी नही बचता।” तो आप जो कुछ भी कर रहे हैं संघर्ष जारी रखिये।
बाकि आसमान ज़रूर पकड़िए लेकिन ज़मीन से जुड़े रहिए ताकि ज़मीन पे पड़े लोगो के दर्द का एहसास महसूस कर सके।
ख़ैर ढेर इमोशनल भी नही होना है। ढेर ज्ञान भी नही देना है। अब से बस #vocalforlocal रहना है। #babakadhaba.
Gaurav @youtubeswadofficial , Madhur @theplacardguy , Aashutosh , Harsh Beniwal ज़िन्दाबाद।